दुनिया में जितने भी शास्त्र हैं उनमें भोजन से बड़ा कुछ भी नहीं हैं. यह अमेजोन के जंगलों और समुद्र की गहरियों से भी विशाल है.
जिस तरह संसार में एक मानव से दूसरे मानव का DNA नहीं मिलता, उसी प्रकार किसी एक घर के भोजन से दूसरे के घरों का भोजन मेल नहीं खाता. यह स्थिति होटलों, ढ़ाबों, ग्रामीण बाजारों और पिकनिक के दौरान बनाए गए भोजनों पर भी लागू होता है.
यही कारण है कि दुनिया में सबसे अधिक इजाद भोजनों पर किया गया. यह प्रक्रिया आज भी जारी है और उम्मीद है कि धरती के बरकरार रहने तक चलेगी.
यह भी तय नियम है कि जो भोजन किसी एक को पसंद हो वह जरूरी नहीं को दूसरे को भी हो; यह संस्कृति, संस्कार और पारिवारिक रिवाजों से जुड़ा है. फलों, अनाजों, सब्जियों, मांस-मछलियों और मसालों के स्वाद एक से हो सकते हैं, पर उनके उपयोग के साथ ही सारे-के-सारे स्वादों में बदलाव हो जाता है. यह क्या है? हम इसका विश्लेष्ण नहीं कर सकते, हमें पाकशास्त्र का किताबी ज्ञान नही है.
जो हमारे बच्चे बड़े शहरों की तरफ पढने-लिखने या यह कहें कि नई सदी के ज्ञान को प्राप्त करने को चले गए (कारण चाहे जो भी हो) उन्होंने अब पिज़्ज़ा बहुत रास आने लगा है जिसे भारतीय घरों में दादी या माँ ने कभी बनाना सीखा नहीं और यहाँ तक कि इसे कोई तबज्जो भी नहीं दिया.
रोम से भारतीय संस्कृति का वैसा कोई रिश्ता नहीं है जैसा कि यूनान, मिश्र, चीन, ईरान, ईराक और इंग्लेंड, फ़्रांस, हालेंड और पुर्तगाल से रहा. खाने की वस्तुओं में, आलू, टमाटर, मिर्च, गोभी, बैंगन आदि उन लोगों ने भारत में लाया जो समुद्र पार कर इसे लूटने आये थे. वह एक अलग जमाना था. लेकिन ऐतिहासिक सचाई यह है कि किसी बारबेरियन ने जब इटली पर कब्जा कर लिया था तो भारत से भेजे गए कुछ बोरे काली मिर्च के बदले रोम को आजादी मिली थी. यह सब भी इतिहास में होता रहता है.
तो, अपने बच्चे अब पिज़्ज़ा के इतने शौकीन हो गए है कि जब भी वे छुट्टियों में घर आते हैं तो उसकी कहानी सुनाना नही भूलते. हमें उकसी कीमत से थोड़ी हैरानी होती है. फिर राहत इस बात की भी होती है कि चलो बच्चों को बाजार जाने की जरूरत नही पड़ती ऑर्डर करते ही पिज़्ज़ा घर पर आ जाता है. यह एक संस्कृति है व्यापार करने की जो इंसान को सुविधा तो देता है पर उसके पैर नही हिलते. आप जानते हैं कि आप यदि चले-फिरेंगे नहीं तो आपको कई तरह की बीमारियाँ जवानी के दिनों में ही हो जाएंगी; तो थोड़ा चिंता होती है उनके लिए जो पिज़्ज़ा खाते हैं.
लेकिन यदि मूढ़ी-घुघनी जैसी कोई चीज खाई जाए तो वह आपके दरवाजे चलकर नहीं आयेगी. इसे बेचने वालों ने ग्राहकों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की. दरअसल आज भी यह मात्र 20 रूपये में मिल जाता है जहाँ भारतीय रूपये के डालर के मुकाबले गिरने का अहसास नहीं होता. लेकिन पिज़्ज़ा? 300 से 500 रूपये का एक.
पिज़्ज़ा में होता क्या है? मैदा, नमक, चीनी, टमाटर, कुछ कटे हुए फल और चीज जिसे अवन में सेंक कर बनाया जाता है. कीमत ऊपर लिखा है.
और घुघनी-मूढ़ी में क्या होता है? चावल की मूढ़ी, चने का घुघनी जिसे प्याज, लहसून, अदरख, मिर्च, सरसों के तेल और तमाम तरह से भारतीय मसलों से बनाया जता है और इसके साथ बेसन में तला हुआ प्याज के कुछ पकौड़े, आलू में सने एक बड़े से आलू-बाडा, फिर ऊपर से काला नमक, स्वाद के लिए कच्चा प्याज और एक हरी मिर्च. दाम मात्र 20 रूपये, जिसे सखुए के पत्ते से बने उस दोने में परोसा जाता है जो पर्यावरण के हिसाब से भी फिट है.
अक्सर यह देखता हूँ कि बच्चे जब भी घर आते हैं और उन्हें घुघनी-मूढ़ी वाली प्लेट आगे बढ़ा दिया जाए तो टूट पड़ते हैं और थोड़ा तीखा लगा तो भी तारीफ करना यह कहकर नहीं भूलते कि वहां तो यह मिलता ही नहीं.
खुदा खैर करे; बच्चों ने अपनी संस्कृति को बचा के रखा है.

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By lamppost

Dr. Brajesh Verma was born on February 26, 1958, in the Bhagalpur district of Bihar. He has been in the field of journalism since 1987. He has worked as a sub-editor in a Hindi daily, Navbharat Times, and as a senior reporter in Hindustan Times, Patna and Ranchi respectively. Dr. Verma has authored several books including Hindustan Times Ke Saath Mere Din, Pratham Bihari: Deep Narayan Singh (1875–1935), Rashtrawadi Musalman (1885–1934), Muslim Siyaasat, Rajmahal and novels like Humsaya, Bihar – 1911, Rajyashri, Nadira Begum – 1777, Sarkar Babu, Chandana, Gulrukh Begum – 1661, The Second Line of Defence and Bandh Gali.